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प्रकृति नियम

भाग 1 से 12 — अवधि 3 साल से 30 साल | राजकुमार, हिसार

भाग - 1

परिचय (पूरा पाठ)

हम शरीर, मन और आत्मा का संगम हैं। शरीर और मन को झुकाने हम चेतना, आत्मा के तल पर आ सकते हैं और खुद को जान सकते हैं। और दुखों से पार हो सकते हैं। अब सवाल यह उठता है कि शरीर और मन को कहां झुकाएं। शरीर और मन को हम वहां झुका सकते है जहां हम चाह कर भी कुछ भी ना दे सकें और हमारा अंहकार पैदा ना हो सके। जैसे सुरज, चांद, पृथ्वी, प्रकृति, माता–पिता, यह सब सदैव हमें देते ही रहते हैं, पर बदले में हम उन्हें कुछ भी नही दे सकते।

नियम:–

नोट :–

नारी ऊजंा शक्ति का प्रतीक है इसलिए वह गुरू धारण नहीं कर सकती, औरत/ नारी को सुबह और शाम को सूरज देवता की आदर भाव से झुक कर प्रणाम करें और धरती मां के चरण स्पर्श करें।

भाग - 2

हमारे जीवन मे दुख का मुख्य कारण पकड़ है। दुख पर पकड़ या सुख पर, अच्छे पर या बुरे पर, विचारों पर या परिस्थितियों पर, जब भी किसी चीज की अति होगी वो दुख पैदा करेगी। हम चाहकर भी इस पकड़ से या परिस्थिति से पार नहीं हो सकती और उलझते ही जाते हैं, जो अधिक दुख और परेशानी हमारे जीवन में पैदा करता है। बड़ा ही आसान तरीका है इस पकड़ से दूर होने का।

जब भी हमारे जीवन में कोई दुख, परेशानी, समस्या या डर या कोई बीमारी का डर सताए तो खुले आसमान में बाहर आ जाना और हाथ जोड़कर सीधे खड़े हो जाना। प्रकृति के सामने समर्पण कर देना और बोलना, हे प्रकृति, परमात्मा, मैं तेरी शरण में हूं। मेरे जीवन में जो कुछ भी हो रहा है, वही मेरे लिए अच्छा है। मैं स्वीकरण करता हूं और इसी भाव से झुकते जाना कि आपके दोनों हाथ धरती को छुएं। ऐसा करने से आप शांत हो जाओगे और एक रास्ता मिलेगा जो प्रकृति में आपके लिए बनाया है।

नोट :–

यह विधि उन्हीं लोगों के लिए कारगर या लाभदायक है जो नेचर स्पिरिचुअल हेल्थ सेंटर में दिए गए प्रकृति के नियमों भाग-1 का पालन कर रहे हैं। क्योंकि जब तक आपके आपका प्रकृति के साथ लगाव नहीं हो जाता, तब आपके अंदर स्वीकार भाव का या समर्पण का भाव पैदा नहीं हो सकता।

भाग - 3

स्वस्थ शरीर ही होना खुशहाल जीवन के लिए अनिवार्य है। इसके बिना आप अच्छे ओर सुन्दर जीवन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। अगर आप स्वस्थ हैं तो जीवन की सभी परिस्थिति का आंनद ले सकते हैं। सबसे पहले कौन-कौन सी वस्तुएं और पदार्थ हैं जो हमारे शरीर के लिए हानिकारक है जान लें →

हानिकारक पदार्थ व आदतें:

  • शराब/नशीले पदार्थ का सेवन
  • मांस, अंडा आदि का सेवन,
  • बीड़ी, सिगरेट और तंबाकू आदि का सैवन
  • शाम को सूर्य अस्त के बाद कुछ भी खाना और पीना
  • पशु का दूध और उससे बनने वाले पदार्थ जैसे दही, मक्खन, पनीर, घी आदि का सेवन. सूर्य अस्त के बाद किसी भी इलेक्ट्रॉनिक आइटम को देखना या प्रयोग करना जैसे माबाइल, टीबी आदि।
  • रात को 8:00 पीएम के बाद घर से बाहर रहना,
  • सूर्य उदय के बाद और सूर्यास्त से पहले लेटना या सोना,
  • फ्रीज में रखे पदार्थ सब्जी आदि का प्रयोग।

प्रकृति ने हमें सुंदर शरीर प्रदान किया है। हमारा प्रथम कर्तव्य हैं की हम शरीर को हर अवस्था में स्वस्थ रखें और प्रकृति के नियमों का पालन करके हम अपने शरीर को स्वस्थ ओर ऊर्जावान सुन्दर बना सकते हैं।

स्वस्थ दिनचर्या:

  • पानी सूर्य उदय से पहले लगभग 5:00 एएम के बीच लें
  • नहाना, सूर्य उदय से पहले
  • नाश्ता 9:00 से 10:00 के बीच
  • दोपहर का खाना 4:00 से 5:00 के बीच
  • पानी 6:00 बजे के पहले ही लें।
  • 6:00 बजे के बाद कुछ भी ना खाएं और पिएं, पानी तक भी नहीं पीना।
  • सूर्य अस्त से पहले घर की और चल पड़े।
  • 8 पीएम के करीब सो जाएं।
  • सुबह उठने के बाद शाम तक लेटे नहीं, बिना सहारे के बैठे
  • शाम के बाद विश्राम अवस्था में रहे बिना सहारे के लेटे
  • नंगे पैर सुबह और शाम को लगभग 10 मिनट चलें
  • शाम के खाने में एक प्लेट सलाद की जरूर खाएं।
  • सुबह और शाम को खाने मैं जूस, फूट और कुछ मीठा लें।
  • यदि दिन में पानी पीना ही है तो खाना खाने के बीच में पियें
  • दूध ओर दूध से बने पदार्थ जैसे दही, घी, दूध, मक्कन, पनीर का सेवन ना करें।
  • फ्रीज में रखे पदार्थ का सेवन ना करें।
  • सप्ताह में एक दिन घर पर रहें।
  • 15 से 20 के अंदर ये बाद बाहर घूमने के लिए जरूर जाएं।
  • घर पर आने के बाद मोबाइल का प्रयोग ना करें।
  • जब भी कुछ खाना हो या पीना हो नीचे बैठकर खाएं व पिएं।
  • लेडीज खाना नीचे बैठकर बनाएं।
  • सप्ताह में एक बार सिर धोएं।

भाग - 4

दिव्य आत्म-बोध मंत्र
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मैं ही हूं। मैं ही हूं。
मैं ही सूरज, मैं ही चन्दा,
मैं ही धरती हूं,
मैं ही माता, मैं ही पिता,
मैं ही सखा हूं, मैं ही है, मैं ही है。
मैं आकाश, मैं ही पर्वत,
मैं ही समुंदर हैं, मैं ही झरना, मैं ही पानी,
मैं ही सितारा हूं,
मैं ही राजा हूं, मैं ही राजा हूं। मैं ही राजा हूं。
इस दुनिया का मैं ही राजा हूं।

ॐ नमः शिवाय। ॐ नमः शिवाय। ॐ नमः शिवाय।

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